Sunday, September 23, 2007
kavita
मोहब्बत होई हवाऊँ सय्हवाऊँ ने रुख़ बद्लामें ने मोहब्बत की चांद सय्व्हो हेर रात चुफ्ता रहामें ने सुबह के उजलूं सय मोहब्बत कीमागर व्हो अन्धैरूं में डूबते रहय्मोहब्बत होई सप्नू सय व्हो बिखरने लगाय्याप्नी मोहब्बत ख्वाहिशात के नज़र कीइतूऊ वहू हसरत बनने लगेंन्न्नाब जान चुकी हूँ इतना"सुब झूट है येह्ह्ह"मोहब्बत" कुछ भी नहीइगुद..मोर्निंग..जी..
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment